भक्तों के ऊपर सदा कृपा बरसाते हैं करुणा स्वरूप मे मौजूद नीलकंठ महादेव
•📅 7 अक्टूबर 2026 | सुबह 9:34 बजे
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पौढी गढवाल।नीलकंठ महादेव मंदिर उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में ऋषिकेश के समीप मणिकूट पर्वत पर स्थित भगवान शिव का एक अत्यंत पवित्र और ऐतिहासिक तीर्थ स्थल है। समुद्र तल से लगभग 1,330 मीटर (4,360 फीट) की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता बल्कि अपने महान पौराणिक महात्म्य के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। यह वही दिव्य स्थान है जो पूरी सृष्टि को विनाश से बचाने वाले महादेव के करुणा भाव और उनके 'नीलकंठ' कहलाने की अमर गाथा की गवाही देता है।
शास्त्रों और हिंदू मान्यताओं के अनुसार, आदिकाल में जब देवताओं और असुरों के बीच अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन हो रहा था, तब मंदार पर्वत की मथनी और वासुकी नाग की रस्सी की मदद से सागर से 14 रत्न निकले थे। लेकिन इन रत्नों के साथ ही एक भयंकर और विनाशकारी हलाहल (कालकूट) विष भी प्रकट हुआ। इस विष की तीव्रता इतनी अधिक थी कि इससे पूरी सृष्टि का अंत हो सकता था।
जब ब्रह्मांड को बचाने का कोई और उपाय नहीं सूझा, तब सभी देव और असुर भगवान शिव की शरण में पहुंचे। संसार के कल्याण के लिए कृपालु भोलेनाथ ने उस भयानक विष का पान कर लिया। विष को गले से नीचे उतरने से रोकने के लिए माता पार्वती ने शिवजी के कंठ को दबा दिया, जिससे वह विष उनके कंठ में ही ठहर गया। विष के तीव्र प्रभाव के कारण भगवान शिव का गला (कंठ) पूरी तरह नीला पड़ गया और तभी से वे नीलकंठ महादेव के नाम से पूजे जाने लगे।
तपस्या और स्वयंभू लिंग की स्थापना
विषपान के बाद उसके अत्यधिक ताप और जलन को शांत करने के लिए भगवान शिव शीतलता की खोज में हिमालय की ओर चल पड़े। उन्हें मणिकूट पर्वत के पास का यह एकांत और रमणीय स्थान सबसे उपयुक्त लगा। यहाँ पंकजा और मधुमती नदियों के संगम पर, एक वृक्ष के नीचे बैठकर महादेव ने 60 हजार वर्षों तक समाधि ली और घोर तपस्या की। पौराणिक कथाओं के अनुसार, कैलाश पर्वत पर लौटने से पहले भगवान शिव ने इसी स्थान पर अपने कंठ के प्रतीक स्वरूप इस स्वयंभू शिवलिंग को स्थापित किया था, जो आज मंदिर के मुख्य गर्भगृह में एक चांदी की चौकी के बीच विराजमान है।
नीलकंठ महादेव मंदिर की वास्तुकला द्रविड़ शैली से काफी प्रभावित है और इसके रंग-बिरंगे शिखर की नक्काशी देखते ही बनती है। मंदिर के बाहरी शिखर पर समुद्र मंथन की पूरी कथा को मूर्तियों के माध्यम से सजीव रूप से दर्शाया गया है। वहीं, जब भक्त गर्भगृह के मुख्य प्रवेश द्वार पर पहुंचते हैं, तो वहाँ एक विशाल और सुंदर पेंटिंग में भगवान शिव को विष पीते हुए दिखाया गया है। मंदिर के ठीक सामने की पहाड़ी पर माता पार्वती का भी एक भव्य मंदिर स्थित है।मंदिर परिसर ठीक उसी बिंदु के समीप है जहाँ मधुमती और पंकजा नामक दो पहाड़ी नदियां आपस में मिलती हैं।


