📅 26 अगस्त 2026
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बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूं, मैं इन नजारों का अंधा तमाशबीन नहीं

•📅 20 अक्टूबर 2026 | सुबह 4:15 बजे
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बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूं, मैं इन नजारों का अंधा तमाशबीन नहीं
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विनय कुमार पांडेय

दुष्यंत कुमार की रचना है- मैं बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूं, मैं इन नजारों का अंधा तमाशबीन नहीं। इस रचना का जिक्र इस वजह से की बनारस इन दिनों मां की भक्ति में डूबा है। शहर और देहात के 512 पूजा पंडालों में 725 दुर्गा प्रतिमाएं स्थापित हैं। जगह-जगह डांडिया और गरबा के आयोजन हो रहे हैं। पंडालों में भीड़ है। सड़कें और गलियां तक ठसाठस हैं। कहीं आरती, कहीं जयकारे, कहीं ढोल की थाप पर थिरकते कदम। हर तरफ उत्सव, उल्लास और मेले जैसा माहौल। पुलिस-प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती है। नवरात्र खैरियत से संपन्न कराने के साथ 22, 24 और 25 अक्टूबर को होने वाले एयर शो की व्यवस्थाएं भी संभालनी हैं।

इस बीच, शहर अपनी रफ्तार में था। किसी को मां के दर्शन की जल्दी थी, कोई परिवार के साथ पंडाल घूम रहा था। कोई उत्सव की रंगीनियों में खोया था। शोर और रोशनी के बीच शारदीय नवरात्र के अष्टमी की रात करीब 12.30 बजे लहुराबीर चौराहे पर एक छोटी बच्ची खड़ी थी। हाथ में रंग-बिरंगे गुब्बारे थे। आंखें आने-जाने वालों के चेहरों पर टिकी थीं। वह हर चेहरे को पढ़ती, हर गुजरते शख्स से उम्मीद बांधती, फिर किसी दूसरे चेहरे की ओर देखने लगती। उसे मां के दर्शन नहीं करने थे, गुब्बारे खरीदने वाला खरीदार तलाशना था।

रात गहरा चुकी थी, मगर बच्ची के लिए दिन खत्म नहीं हुआ। उसके हाथों में बचे गुब्बारे शायद घर लौटने का रास्ता तय करने वाले थे। भीड़ अपनी रौ में थी। हजारों-हजार लोग वहां से गुजरे, लेकिन बहुत कम लोगों की नजर उस बिटिया पर पड़ी। जिनकी पड़ी, वे गुब्बारा खरीदे बिना आगे नहीं बढ़ सके। थोड़ा ठहरिए, सोचिए, उस वक्त कितने घरों में बच्चे गहरी नींद में सो रहे होंगे। कितने माता-पिता अपने बच्चों को मेले से खिलौने दिलाकर घर लौट चुके होंगे। उसी शहर में एक बच्ची आधी रात को इसलिए खड़ी थी कि कोई उसके हाथ से एक गुब्बारा खरीद ले। मां के दरबार में भक्त अपनी मुरादें लेकर पहुंचे थे। 

कोई सुख मांग रहा था, कोई समृद्धि, कोई परिवार की सलामती। लेकिन, लहुराबीर पर खड़ी उस बच्ची की मुराद शायद बहुत छोटी थी। बस इतने गुब्बारे बिक जाएं कि वह घर लौट सके। बच्ची की आखें बता रही थीं कि भीड़ में होना और किसी का ध्यान मिलना दो अलग-अलग बातें हैं। खैर, अदम गोंडवी के शेर से इस उजासवंचना को विराम देते हैं- भूख के एहसास को शेरों-सुख़न तक ले चलो, या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो।

- हर बच्चे के हिस्से में एक जैसा बचपन नहीं 

याद होगा, मुंशी प्रेमचंद की ईदगाह में हामिद मेले में खिलौनों और मिठाइयों के बजाय अपनी दादी के लिए चिमटा खरीदता है। दूसरे बच्चों के लिए मेला खुशियों का संसार है, हामिद के लिए उसमें घर की जरूरत भी शामिल थी। लहुराबीर की बच्ची की कहानी अलग है, लेकिन उसका दृश्य भी बचपन के बारे में सोचने को मजबूर करता है। हर बच्चे के हिस्से में एक जैसा बचपन नहीं आता।
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