भारतीय ज्ञान परंपरा का बनेगा विश्वकोश, वेदों से विज्ञान तक के स्रोत होंगे एक जगह संकलित
•📅 14 अक्टूबर 2026 | शाम 2:31 बजे
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प्रयागराज। भारतीय ज्ञान परंपरा विश्वकोश के निर्माण की दिशा में एक कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित प्राचीन ग्रंथों, पांडुलिपियों, ऐतिहासिक अभिलेखों तथा विभिन्न विषयों में उपलब्ध प्रमाणिक ज्ञान-स्रोतों की पहचान करना और उनका व्यवस्थित संकलन एवं दस्तावेजीकरण करना था, ताकि इन स्रोतों को आधुनिक शोध-पद्धतियों के माध्यम से विद्यार्थियों, शोधार्थियों, शिक्षकों और आम पाठकों के लिए सुलभ बनाया जा सके।
इस कार्यशाला में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय, केंद्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT), मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (MNNIT), इलाहाबाद विश्वविद्यालय तथा डी.ए.वी. कॉलेज सहित विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों से जुड़े विद्वानों एवं विषय-विशेषज्ञों ने सहभागिता की। कार्यशाला में बौद्ध धर्म, जैन धर्म, संस्कृत, पांडुलिपि अध्ययन, अरबी एवं फारसी, शरीर विज्ञान, आयुर्वेद, अर्थशास्त्र, शिक्षा, सिविल इंजीनियरिंग, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, मराठी, समाजशास्त्र और इतिहास जैसे विविध विषयों पर चर्चा की गई। विश्व आयुर्वेद मिशन के संस्थापक अध्यक्ष एवं आरोग्य भारती के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रो.(डॉ) जी. एस. तोमर ने आयुर्वेद के क्षेत्र में विषय-प्रतिनिधि के रूप में सहभागिता की। विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों की उपस्थिति ने भारतीय ज्ञान परंपरा के बहुआयामी स्वरूप को समझने और उसके व्यवस्थित दस्तावेजीकरण के लिए अंतर्विषयक सहयोग की आवश्यकता को रेखांकित किया।
समग्र रूप से, भारतीय ज्ञान परंपरा विश्वकोश निर्माण कार्यशाला भारतीय बौद्धिक विरासत के संरक्षण, संकलन और व्यवस्थित प्रस्तुतीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल रही। विभिन्न विषयों के विद्वानों की सहभागिता ने स्पष्ट किया कि भारतीय ज्ञान परंपरा का व्यापक दस्तावेजीकरण इतिहास, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, चिकित्सा, अर्थशास्त्र, शिक्षा और पांडुलिपि अध्ययन सहित अनेक क्षेत्रों के संयुक्त प्रयास से ही संभव है। प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह के नेतृत्व में विश्वकोश के प्रथम भाग को ग्रंथसूची के रूप में विकसित करने की प्रस्तावित योजना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करती है। यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की भावना के अनुरूप भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण, संवर्धन और अध्ययन को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ भविष्य के शोध एवं अनुसंधान के लिए एक उपयोगी संदर्भ-संसाधन विकसित करने में सहायक सिद्ध हो सकती है।




